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Chapter 2

chapter 2

क्यूट कपल

दानियाल खान अपनी छोटी बहन फिज़ा और दादी के साथ माहीन के सामने वाले घर में रहता था। दानियाल के पैरेंट्स न्यूयॉर्क में रहते थे। इत्तेफाक से माहीन  के डैड अफ़रोज़ और  दानियाल के डैड अहमद न्यूयार्क में बिज़नेस पार्टनर थे और वो पुराने पड़ोसी भी हुआ करते थे। यही वजह थी कि माहीन के डैड ने उसे गांव आने दिया था। अफ़रोज़ साहब अपने पैरेंट्स की ज़िन्दगी में गांव में रहते थे।वहां अहमद खान उनके पड़ोस में अपनी फैमिली के साथ रहते थे।दोनों खानदानों की खूब बनती थी। अफ़रोज़ साहब की मां रोकैया बेगम और अहमद की मां शहाना खान बचपन की सहेलियां थी, शादी के बाद दोनों पड़ोसन बन गई थी। सोने पे सुहागा जैसी बात थी।लेकिन फिर अफ़रोज़ अपने वालिदैन के इंतकाल के बाद विदेश में शिफ्ट हो गए थे।            माहीन की पैदाइश न्यूयार्क की थी, लेकिन मिसेज अफ़रोज़ ने उसे अच्छी खासी हिदुस्तनी तहज़ीब तो सिखाई थी लेकिन विदेश में रहने का असर था। उसके कपड़े पहने का तरीका भी मिला जुला था, हिंदी भी अच्छी ही बोल लेती थी और बड़ों की इजज़त भी करना जानती थी।अफ़रोज़ के विदेश जाने के कुछ सालों बाद अहमद को काम के सिलसिले में अपनी फैमिली के साथ न्यूयार्क शिफ्ट होना पड़ा। तब दानियाल सिर्फ पांच साल का था।उसका  विदेश में मन नहीं  लगता था, जब वो पंद्रह साल हुआ तो अपनी दादी और छोटी बहेन फिज़ा के साथ वापिस अपने मुल्क आ गया। फिर कभी न्यूयार्क नहीं गया ।साल में एक दो बार उसके पैरेंट्स उनसे मिलने आजाया करते थे। माहीन की शक्ल सूरत में हिन्दुस्तानी झलक तो थी लेकिन वो अमेरिकन जैसे गुलाबी गोरी थी,उसके बाल हलके भूरे रंग के थे  और आंखे कली थीं। माहीन चंचल मिजाज़ की जायदा बातें करने वाली थी। जानवरों से उसे बहुत प्यार था। खास तौर पर बिल्लियों से, बचपन से लेके अब तक उसने कई बिल्लियां पली थीं। हिंदुस्तान आने से कुछ महीने पहले ही उसने सुल्तान को एडॉप्ट किया था और अब दोनों में अच्छी बॉन्डिंग भी थी।ग्रे, कली और सफेद धरी वाले बिल्ले को देख कर माहीन फुली नहीं समाती थी। फखर करती भी क्यों न सुल्तान। हर वक़्त माहीन से चिपका रहता और उसकी हर बात मानता था लेकिन जब उसने दानियाल की सुनहरी और सफेद बिल्ली को देखा था तब पहली बार उसने माहीन को नजरंदाज किया था। ये बात उसे हज़म नहीं हुई और उसने दानियाल को खूब सुनाया था।"दादी, सामने कोई शिफ्ट हुआ।"फिज़ा ने पराठे का निवाला मुंह में लेते हुए कहा।"अच्छा कौन" दादी दानियाल की प्लेट में सब्जी डालते डालते रुकी  और फिज़ा से बातों में  लग गई ।" एक लड़की है और उसकी बिल्ली, मैंने और किसी को नहीं देखा" फिज़ा ने कहा।"वो बिल्ला है" फिज़ा की बात सुन के दानियाल के मुंह से अचानक निकाल गया।"वो बिल्ली नहीं बिल्ला है,  ये बात तुमको कैसे पता " दादी ने हैरत से दानियाल को देखता हुए कहा।"हां भाई , क्या आप उनसे मिल चुके है"फिज़ा के लहजे  हैरत और दिलचस्पी थी।"हां, बदकिस्मती से" दानियाल ने दोनों को थोड़ी देर देखा और कहा "ऐसा क्यों, बोलरहे  हैं भाई  मुलाकात अच्छी नहीं रही क्या" फिज़ा और दादी दोनों हैरत से उसके जवाब का इंतजार कर रही थी।"क्या......,आप दोनों ऐसे क्यों देख रही हैं, चुप चाप नस्ता करो" दानियाल परेशान हो रहा था ।"सुल्तान,मैंने यहां आने से पहले ये तो सोचा ही नहीं की में खाना  कैसे खाऊंगी बनाने तो मुझे आता नहीं और फूड डिलिवरी भी मुश्किल हो गी यहां " माहीन सुल्तान के सामने रखे प्याले में उसका खाना डालते हुए उससे बातें कर रही थी।सुल्तान एक बार माहीन की तरफ देखता और एक बार अपने खाने की तरफ जैसे वो उसकी परेशानी समझ रहा हो।"आह! सुल्तान तुम्हारे खाने का पैकेट भी खाली हो रहा है। मुझे शॉपिग भी जाना होगा।" उसने पैकेट टेबल पर रखा और सोफे पे बैठ गई।लैपटॉप में बिज़ी, दानियाल की नज़र बाहर जती दादी, फिज़ा और उनके पीछे दबे पांव जाती लिसा पर पड़ी।"कहां जा रही हैं आप लोग" दानियाल की आवाज़ पे सब रुक गए। "नई पड़ोसी से मिलने"दादी ने खाने का डब्बा दिखाते हुए कहादानियाल ने अपना लैपटॉप टेबल पे रखा और लंबी लंबी दिंगे मार के लिसा को गोद में उठा लिया और कहा"अब जाइए""अच्छा तो तुम लिसा को भी नहीं जाने दो गे",दादी ने दानियाल को घूरा और फिज़ा को लेके बाहर निकाल पड़ी। "आपको क्या पता दादी वो कैसी है" दानियाल ने आह भारी।माहीन और दानियाल के घर बीच मुश्किल से दो गज़ का फासला था। दोनों घरों के अगल बगल दूर दूर तक कोई घर नहीं था बल्कि माहीन के घर के पीछे कुछ ही दूरी पर दो चार घर थे। दानियाल के घर के आस पास की सारी जमीनें उसके वालिद साहब ही की थी।    डोरबेल सुन के माहीन ने हैरानी से दरवाज़ा खोला था।सामने एक कम उम्र और एक बूढ़ी और सेहतमंद औरत को देख के माहीन ने फौरन सलाम किया। फिज़ा और दादी ने बड़ी मोहब्बत से सलाम का जवाब दिया था।"हम सामने वाले घर से आए है," फिज़ा ने  माहीन के अनकहे सवाल का जवाब दिया।"ओह, वेलकम प्लीज़ अंदर आ जाइए।" माहीन ने दरवाजे से पीछे हट के कहा।"कैसी है आपलोग?" माहीन ने उनके सामने कूकी का पूरा डब्बा और पानी  बॉटल रखते हुए पुछा।"अल्लाह का शुक्र है बेटा", दादी ने माहीन को प्यार भरे लहजे में जवाब दिया। "व्हाट इज योर नेम?" माहीन ने फिज़ा की तरफ कुकी का डब्बा बढ़ाते हुए पूछा।"फिज़ा, शी इज माई ग्रंडमदर"  फिज़ा ने मुस्कुराते हुए दादी की तरफ इशारा किया।"नाइस नेम फिज़ा""आप भी खाओ न दादी" माहीन ने डब्बा दादी की तरफ बढ़ाया।"माई सेल्फ माहीन अफ़रोज़" माहीन ने अपना तारूफ कराया।"तुम अफ़रोज़ की बेटी हो" दादी के लहजे में अपनापन था। "ओ.. हा, क्या आप डैड को जानती हैं" माहीन ने हैरत से पूछा।"हां,क्यों नहीं। तुम्हारी दादी मेरी बेस्ट फ्रंड थी और पड़ोसी भी थे हम" दादी ने कहा"दादी, मै तो किसी को नहीं जानती।" फिज़ा ने भोला सा मुंह बना के कहा।"अरे, मेरी बच्ची तुम अभी पैदा भी नहीं हुई थी तभी अफ़रोज़ विदेश चला गया था, दानियाल जनता है।"दादी। ने फिज़ा सर सहलाया ।"दानियाल कौन है" माहीन ने पूछा"मेरे बड़े भाई है" फिज़ा ने झट से केहा फिज़ा कुछ पूछती इतने में सुल्तान आ गया।" सुल्तान इधर आओ, हैलो कहो दादी और फिज़ा को"  सुल्तान को गोद में उठाकर  माहीन ने उसका हाथ लहराया।"वाओ! कितना प्यारा है सुल्तान। हमारे पास भी बिल्ली है उसका नाम लिसा  है।"फिज़ा खुशी से उछली।"अच्छा माहीन बेटा,अब मै चलती हूं।इसमें खाना है खा लेना।" दादी ने टेबल पे डब्बा रखते हुए काहा।"फिज़ा तुम ज़रा और देर माहीन के पास रुको  और हा माहीन घर आते जाते रहना।" जाते हुए दादी ने रुक कर कहा। सुबह के चार बजे थे । दानियाल अपने गार्डन में पौधों की छटाई कर रहा था ।अचानक उसे कहीं से कुछ जलने की बू आई। उसने चारो तरफ का जयेजा लिया। धुआं सामने वाले घर से आरहा था।दानियाल परेशान होगया उसे पता था वहां अकेली लड़की है।    दानियाल परेशानी के आलम में माहीन के  घर की तरफ दौड़ा.............लेखिका - Seema Firdous

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