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Chapter 20

chapter 20

क्यूट कपल

रात भर की पुरसुकून नींद के बाद सुबह के दस बजे अहमद साहब की आंख खुली थी। कमरे से बहार आकर पता चला कीसुबह उठने वाले वो पहले फर्द थे। वो अपने बाज़ुओं को फैलाये  ज़ोर दार अंगड़ाई लेते हुए बहार जाने के इरादे से हॉल की तरफ बढ़े। मंज़रे-हॉल ने उनकी अंगड़ाईयों का ज़ोर तोड़ दिया।वो इस कदर शर्मा गये की इधर उधर देखते हुए दबे पाओं गार्डन में आगये ।"आह। आज कल के बच्चे भी न" अहमद साहब ने गार्डन में लगी बेंच पर बैठते हुए आह भरी।दानियाल और माहीन बातें करते करते न जाने कब एक दूसरे की बाहों में सोगये थे। "भाई, इन हरकतों से लगता है बाज़ नहीं आने वाले " नासिर की ज़ोरदार आवाज़ ने आखिर माहीन और दानियाल को गहरी और उल्फत भरी नींद से जगा दिया।आंख खुलते हीं अपने इर्द गिर्द सब को देख कर दानियाल खुद  को किसी मिठाई का टूकड़ा सा महसूस कर रहा था जिसे खाने के  लिए चारों तरफ से चीटिओं ने घेर रखा हो।बिजली की तेज़ी से दोनों एक दूसरे से अलग हुए। सुकून और लम्बी थकान ने उन्हें एहसास ही न होने दिया की घर में बड़े भी मौजूद हैँ।नासिर ने हिना को गार्डन तक छोड़ कर सब को नाश्ते पर ज्वाइन  किया।घर के बड़े संजीदगी भरी खामोशी से खाने में मशरूफ थे। फ़िज़ा कभी उन्हें देखती तो कभी अपने दोनों  भाइयों को जो उन्हें खामोश और संजीदा देख कर  सोच रहे थे कि आखिर क्या बात है ।"नासिर क्या तुम हिना को पसंद करते हो" ये शहाना बेगम की आवाज़ थी। वो काफी संजीदा थी। इससे पहले नासिर ने नानी जान को इतना संजीदा नहीं देखा था। "क् ... क ... क्या..." नासिर हकलाया। सबकी नज़र नासिर की तरफ थी। फ़िज़ा और दानियाल अपने  लबों को दांतों तले कुचल कर अपनी हसीं दबाने की कोशिश  कर रहे थे। नासिर को शक था की  ज़रुर दानियाल भाई ने तो ये बात बड़ों के कान  में  डाली होगी।उसे कहाँ खबर थी की उसकी अम्मी जान भी उन दोनों से बाखबर थी।"ये कॉलेज के दिनों से ही उसे पसंद करता है" नासिर को हकलाता देख दानियाल ने बात समेटी। "फ़िज़ा, ऐसा क्या डिस्कस हो रहा होगा" माहीन ने उसे साथ उसके बेड पर बैठी फ़िज़ा से कहा।"अल्लाह जाने भाभी, मेरे तो ख्याल के तोते भी वहां पर नहीं मार सकते"  फ़िज़ा ने बेबसी से कहा।दनियाल की तरफ माहीन के पेरेंट्स, दानियाल के पेरेंट्स, दावर की मॉम, नासिर की मॉम(रीम) और दादी घर के सब बड़े न जाने किस खास बात को लेकर मीटिंग कर रहे थे की फ़िज़ा, दानियाल और नासिर को माहीन की तरफ जाने को कह दिया था।माहीन ने सामने सोफे पर बैठे दानियाल,दावर और नासिर पर नज़र डाली वो भी बेबसी से उस मीटिंग के मकसद का अंदाजा लगा रहे थे। बड़ों ने हालात और वक़्त के तकाज़े को देखते हुए जल्द से जल्द शादी का फैसला किया। दानियाल के पैरेंट्स फ़िज़ा को अभी विदा नहीं करना चाहते थे। लेकिन दावर की मॉम के इसरार पर उन्होंने हाँ कर दी।नासिर को हिना के फोन ने परेशान कर दिया की उसे लड़के वाले देखने आ रहे हैं। उसे कहाँ चैन आना था। जब तक उस ने नानी के मुँह से सुन न लिया की "तैयार हो जाओ हम हिना के घर जा रहे हैँ।""गार्डन में मिलो बात करनी है"दानियाल का मैसेज मिलते ही माहीन नीचे को दौड़ी। रिदा ने उस रोक लिया"कहाँ जारही हो।" "गार्डन में " माहीन ने जवाब दिया। "किस लिए" रिदा के दोबारा सवाल ने माहीन को मुजरिम सा एहसास कराने लगे।"जी... वो दानियाल ने बोला आने को" पहले तो माहीन को लगा की क्या मुझे वाक़ई जवाब देने की ज़रूरत है लेकिन उसे उसके मॉम के चेहरे के तास्सूर ने खौफ़ज़दा कर दिया।लिहाज़ा दोनो को मिलने पर पाबंदी लग गई। "कब से वेट कर रहा हूँ तुम आई क्यों नहीं"  इंतज़ार करते दानियाल ने माहीन को फ़ोन किया।"मै नहीं आ सकती" माहीन को समझ नहीं आया की वो क्या कहे कि अमरीका में रहने वाली उसकी हिंदुस्तानी तहज़ीब की कायल मॉम ने उनके मिलने पर पाबंदी लगा दी है।"कहीं ऐसा तो नहीं की रिदा ऑन्टी ने तुम्हें मुझसे मिलने से मना कर दिया है" दानियाल ने गेस करने के अंदाज़ में  बोला।"ओह! तुन्हे कैसे पता " हैरानी से माहीन की आवाज़ ज़रा ऊँची हो गई।"हाउ कूल।" "व्हाट, तुम्हे ये कूल लग रहा है" माहीन को वाक़ई हैरत हुई दानियाल को इस बात से खुश होने पर।रात के खाने के बाद आखिरकार उनकी शादी का ऐलान  खानदान के अफ्राद में कर दिया गया और अगले ही दिन इनविटेशन कार्ड की शक्ल में  सभी रिस्तेदारों को भी ये खुशखबरी मिल गई।शादी की डेट सिर्फ दो दिन के बाद की थी। घर के बड़े दरअसलइस शादी को सिर्फ निकाह की रस्म से निपटाना चाहते थे।दानियाल, दावर  और नासिर को भी इससे कोई ऐतराज़ न था।मर्दों  को भला क्या ही इतराज़ हो सकता है। परेशानी तो फ़िज़ा और माहीन को होनी थी। पार्लर, शॉपिंग, स्किन ग्लो और न जाने क्या- क्या। पार्लर के लिए तो फ़िरभी  दो दिन ठीक है पर शॉपिंग का क्या। शॉपिंग के लिए तो महीने लगते हैं। यहाँ तो सिर्फ दो दिन थे। खैर उन्होंने एक दिन में ही शॉपिंग मुकम्मल की।शादी की ख़बर मिलते ही नासिर की बड़ी बहन सना भी कनाडा से आ गई थी।शादी की तैयारियों में उसने भी बहुत हाथ बताया जबकि वो प्रेग्नेंट थी।शहाना बेगम उसे बहुत आराम करने को कहती। उन्हें डर थी की कहीं वो इस हाल में काम कर कर के खुद को बीमार न कर ले।लेकिन सना कहाँ मानती उसके दो भाययों  और एक लाडली बहन की शादी जो थी।मशरूफियत के दो दिन गुज़र गये। घर में मेहमानों की तादाद मे इज़ाफ़ा होगया था। चारों तरफ रौनक थी। फज़ाएँ खुश्नुमा थी। दूल्हे तैयार थे। उनकी शेरवानियां और अतर की खुशबू माहोल को बेइंतेहा खुमार बक्स रही थी।शहाना बेगम उनकी नज़रें उतारते नहीं थक रही थीं। उनकी आंखें से बार-बार खुशी के आंसू बह रहे थे। शिबा का यही हाल था। सना की खुशी का ठिकाना ही न था। इंसान की फितरत ही ऐसी है की दुख में तो रोता ही है खुशी में भी आंखें नम हो जाती हैं।"नानी जान, क्या में शेरवानी में इतना बुरा लग रहा हूँ की आप बार- बार रो रही हो" नासिर ने शहाना बेगम के आंसू साफ करते हुए बोला।नासिर के सवाल ने आसपास मौजूद सभी लोगों के होंठो पे हसीं बिखेर दी।माहीन, फ़िज़ा और हिना माहीन की तरफ तैयार हो रही थी। फ़िज़ा और हिना की तमाम दोस्त मौजूद थी। लेकिन कम वक़्त होने की वजह से माहीन की दोस्त अमेरिका से न आ सकी।दोस्तो के हसीं मज़ाक के माहौल में वो उन्हें मिस कर रही थी।"क्या सब तैयार हो गये" शिबा और रिदा कमरे में दाखिल हुई और अपनी बच्चिओं को गले लगा कर रो पड़ी।बेटियों की शादी में माहोल कितना भी खूसनुमा क्यों न हो। उनकी जुदाई का गम तो अंदर ही अंदर खाये जाता है।अहमद साहब ने  फ़िज़ा और दावर, नासिर और हिना का निकाह पढ़ाया।माहीन की ख्वाहिश के मुताबिक अफ़रोज़ साहब ने उसका और दानियाल का निकाह पढ़ाया।बेटियों की विदाई के गम मे दोनों ग़मगीन बाप एक दूसरे के गले लग कर रो पड़े।रात काफी हो चुकी थी। मेहमानों की रुख़सत के बाद नासिर अपनी बीवी ,बहन और मॉम के साथ अपने घर वापिस आ गया था। जहाँ उसके खानदान के लोगों ने उसका वेलकम बड़ी धूम धाम से किया था।शादीओं को हफ्ते गुज़ार गये थे। दानियाल और माहीन के पेरेंट्स, फ़िज़ा और दावर कल शाम की फ्लाइट से अमरीका जा चुके थे।कुछ दिन पहले जिस घर में मेह्मानो की चहल-पहल, नासिर और फ़िज़ा की हसीं मज़ाक और लड़ाईयों की आवाज़ और बड़ों की नसीहत और फरमाइशों की आवाज़ें आती थी। आज वो कितना वीरान सा पड़ा था।उस महल में सिर्फ दानियाल , माहीन और दादी रह गये थे। दानियाल के महल को वीरान कर सब अपने अपने घरों को लौट गये थे। फ़िज़ा की जुदाई दानियाल और माहीन दोनों को खामोश कर गई थी।शहाना बेगम को दोनों की उदासी का खासा अंदाजा था क्योंकि वो भी उसी गम में थी।माहीन किचन में और दानियाल हाल में बैठा अपने काम में  मशरूफ था। "कब जा रहे हो तुम" उन दोनों की खामोशी शहाना बेग़म से अब देखी नहीं गई तो वो अपने कमरे से आकर बेसाखता बोल पड़ी।"ह्म. ..क्या .. मै कहाँ जा रहा हुँ" दानियाल  ने उन्हें  हैरत से देखते हुए कहा।"हनीमून और कहाँ" दादी ने बिना किसी झिझक के कहा।"दादी, आप कब से इतनी ब्रॉडमाइंडेड हो गई" दानियाल हँसा।शादी के बाद तुम दोनों  कहीं घूमने भी नहीं गये। देखो, मुझे पता है तुम दोनों फ़िज़ा को मिस कर रहे हो। लेकिन ऐसे उदास रहने से क्या होगा। वो तो अमेरिका मे मज़े कर रही है। और तुम माहीन से किचेन में काम करवा रहे हो" दादी ने किचन से  निकलती  माहीन की तरफ इशारा करते हुए कहा था।"लो दादी, आप माहीन की कुकिंग का तो जानती ही हैँ। मै भला क्यों कहूंगा किचेन में काम करने को" दानियाल ने हॉल की तरफ बढ़ती माहीन की देखते हुए बोला और हँसा ।"हाय,  तौबा... अपनी  बीवी के बारे में ऐसे कौन बात करता है भला। कोई अन बन हुइ है दोनों में " दादी दानियाल को प्यार से डांट लगाते माहीन  से मुख़ातिब हुई।"नहीं दादी, क्या होना है हमारे दरमियाँ ।सब ठीक है।" माहीन ने बड़े आराम से कहा जैसे कल रात कुछ हुआ ही ना हो।दानियाल ने उसके झूठ पर उसे तिरछी नज़रों से देखा।दर असल माहीन कहीं बाहर नहीं जाना चाहती थी। अगर वो दोनों बाहर चले गये तो फिर दादी अकेले हो जाएंगी इसलिए।"अच्छा सुनों तुम दोनों नहीं जाओगे तो मै ही चाली जाती हूं" दादी ने कहा। उन्हें अंदाजा होने लगा होगा की वो मेरी वजह से कहीं नहीं जा रहें हैं।"लेकिन क्यों दादी" दोनों ने उदासी से कहा।"क्यों की मै ऐसे उदास माहौल में नहीं रह सकती।" वो कहती हुई अपने कमरे की तरफ बढ़ी "और हाँ नासिर मुझे लेने आ रहा है" वो दोबारा बोली और अपने कमरे में दाखिल हो गईं।      "कहाँ जा रहे हैँ हम" माहीन ने सीट बेल्ट लगाते हुए पूछा।"वहीं जहाँ मै तुम्हें ले जाना चाहता था" दानियाल ने माहीन का हाथ अपने मज़बूत हाथों में थामते हुए कहा और ड्राइविंग करने लगा।माहीन ने तजस्सूस में उसे देखा और एक बार और पूछ गई"कहाँ?"दानियाल माहीन को उस ठंडी और खुशनुमा वादियों में ले जाना चाहता था जहाँ उसका ड्रीम होटल था। जहाँ दानियाल के होटल के एम्प्लोये किसी क्वीन की तरह उसका वेलकम करने के इन्तेज़र में थे।"वहीं जहाँ पिछली बार बारिश ने हमे पहुँचने नहीं दिया था या  यू कहो की कहीं और पहुंचा दिया था" दानियाल ने "माहीन की आँखों में शरारत और मोहब्बत से झांका।उसकी शरारत भरी आँखों ने माहीन को वो लम्हा याद दिला दिया की जब उन्हें एक दूसरे से मोहब्बत होंने का एहसास हुआ था। उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।"शर्माइए मत मिसेज़ दानियाल, वो तो सिर्फ ट्रेलर था। अभी तो पुरी फिलम बकी है।"दानियाल ने उसका हाथ अपने होंठो से लगाते हुए कहा था।   मोहब्बत और शर्म के मिले जुले एहसास में दोनों  एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए ।                    The Happy ending           From the pen of Seema Firdous

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