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Chapter 8

chapter 8

क्यूट कपल

वो एक घने पेड़ की ओट में खड़े थे, इसके बावजूद भीग रहे थे। बिजली के लगातार कड़कने से माहीन अभी भी दनियाल के सीने में अपना  चेहरा छुपाए हुए थी। लिसा और सुल्तान भी पूरी तरह भीगे  थे।  माहीन की  हालत दनियाल को बेकरारी की हद तक परेशान कर रही थी " माहीन क्या.. तुम्हें ..एस्ट्रोफोबिया है" दानियाल ने माहीन से पूछा। माहीन ने उसकी तरफ देखा और हां में सर हिलाया।                     माहीन को बचपन से ही एस्ट्रोफोबिया ( आसमानी बिजली के कड़कने का डर) था। जो उसकी उम्र के साथ साथ और बढ़ता गया था।   दानियाल जल्द से जल्द उन्हें आराम देना चाहता था।  उसने इधर उधर नज़र दौड़ाई, एका एक उसकी नज़र ज़मीन पर गिरी उस चाभी पर पड़ी जो उस अंजान आदमी ने माहीन को गलतफहमी में थमाई थी, उसने दौड़कर चाभी उठाली।इस वक्त उसे जो सही लग रहा था उसने किया।"माहीन बस थोड़ा और सब्र करो, अगर यह चाबी यहां है तो इसका ताला भी यही होगा" उसने माहिम को हिम्मत  दी और उसका हाथ थामे चल पड़ा।खुशकिस्मती से दस कदम चलने पर ही उन्हें अपनी मंजिल नज़र आने लगी। दानियाल को यकीन था, चाभी उसी घर की थी। दोनो की जान में जान आई। वो तेज़ी से उस तरफ बढ़े।घने और लंबे पड़ों के बीच से कच्चे रास्ते से गुज़र कर, वो उस बड़े गेट तक पहुंचे। दानियाल ने बड़ी चाभी से गेट खोला और सब अंदर दाखिल हुए। वहां एक बड़े और खूबसूरत गार्डन के बीच एक छोटा सा मकान था। वो किसी का फार्म हाउस लगता था।बिना कुछ सोचे समझे वो अंदर चले गए। उनके पास कोई  रास्ता नहीं था। माहीन पर खौफ अभी भी तारी था। वो और क्या करता, हालांकि इससे भी बड़ी मुश्किलों का सामना उसने किया तब शायद वो जज्बातों से आज़ाद  था।अंदर का नज़ारा काफी सुकून देने वाला था। जैसे अभी अभी वहां  सफाई हुई हो।  छोटे से हाल में साफ सुथरे और सलीके से सोफे लगे थे। हाल के एक कॉर्नर पर ओपन किचन था जहां थैले में फल और सब्जियां थी ।हॉल में दाखिल होकर, सबसे पहले दानियाल ने हाल की सारी खिड़कियां बंद की और उनके पर्दे बराबर किए जिससे बिजली की चमक अंदर न आ सके। अब बादलों के गरजने और बिजलियों के चमकने में जरा ठहराव आया। माहीन की हालत थोड़ी सुधरी। वो अभी भी हाल की दीवार से चिपकी ज़मीन पर बैठी थी।     दानियाल ने सुल्तान और लिसा को टावेल से सुखाया और कपड़े की तलाश में बंद कमरे का दरवाजा खोला।माहीन भी उसके साथ कमरे के अंदर दाखिल हुई। कमरा दिलकश अंदाज से सजा था। शायद यहां कोई कपल अपनी रात गुजारने वाले थे। बेड की व्हाइट बेडशीट लाल गुलाब की पंखुड़ियों से ढकी थी और उस पर दो फोल्ड की हुई व्हाइट टॉवेल रखी थी। कैंडल्स और फर्श पर बिछे गलीचे ( मलमली कालीन) कमरे को रॉयल लुक दे रहे थे।कमरे की रंगीनी देख कर दोनो ने हैरानी से एक दूसरे को देर तक देखा और शर्म से नज़रें चुरा गए।    इस दिलकश माहोल में, खुली खिड़की पर किसी का ध्यान ही नहीं गया।बारिशों और हवाओं के ज़ोर थमने का नाम नहीं ले रहे थे कि एक बार फिर बादलों की गर्जन और बिजली की तीखी चमक ने माहीन को दानियाल की बाहों में धकेल दिया।   वो उसके गीले जिस्म की गर्माहट महसूस कर रहा था। दानियाल को कभी किसी औरत में इस तरह दिलचस्पी नहीं हुई थी जिस तरह वो अपनी बाहों में सिमटी माहीन में लेने लगा था।दोनों एक दूसरे की बढ़ती धड़कने महसूस कर रहे थे। उसने माहीन को अपने  बाजुओं की हल्की गिरफ्त में ले कर उसके बालों को सहलाया।इस दिलकश कमरे में वो अपने तूफ़ान से उमड़ते जज़्बात को कब तक थामता। आखिर वो एक मर्द था।  उसने माहीन को उसकी कमर से पकड़ कर खुद से अलग किया और उसके नाज़ुक कंधों अपना सर रख दिया।"माहीन, खुद को संभालो प्लीज़ मैं अपना काबू नहीं खोना चाहता तुम पर..।" उसके लहज़े में माहीन के लिए फिक्र मोहब्बत और कद्र थी।  वो कपड़े लेकर बाहर आ गया।  कबड में हैंग कपड़े देख कर माहीन को  समझ न आया वो क्या पहने वहां सिर्फ स्ट्रिप वाली साटिन की नाईटी थी,हो भी क्यों न आखिर वो किसी कपल के हनीमून स्पॉट पर थे। उसने एक व्हाइट शर्ट पहनी जो उसके घुटनों से ज़रा सा ऊपर थी।इतने भीगे और सर्द मौसम में उस छोटे से हॉल का माहोल काफी गरम था।अब जाके उसने चैन की सांस ली  ही थी की सोफे पे बैठे दानियाल की नज़र कमरे से निकलती माहीन पर पड़ी।  वो उसे देखता रहा, अब तो हद होगई वो उसके बगल में आ बैठी।"वहां सिर्फ नाईटी थी।...इसलिए मैंने ये पहना.." माहीन ने धीमी आवाज़ और शर्मीले लहज़े में कहा।"ज़ाहिर है, हनीमून पर कोई कपड़े तो पहने गा नहीं"  दानियाल ने कहा । माहीन लाजवाब हो गई"तुम ठीक हो" दानियाल ने पूछा।"हां, ...ठीक हूं" माहीन जवाब दिया। " एस्ट्रोफोबिया कब से है" दानियाल ने उसके बारे में और जानने की कोशिश की।"बचपन से" माहीन ने उसे देखा और कहा।"कैसे  हैंडल करती हो" दानियाल ने पूछामाहीन की आंखें नम हो गई, वो ज़रा ठहरी और बोली "पहली बार खौफज़दा नहीं हूं""I am sorry मैंने तुम्हे अपने साथ ला कर मुश्किल में डाल दिया। मुझे इसका पता होता तो मैं ख्याल रखता" दानियाल के लहज़े में शर्मिंदगी और फिक्र थी।"मुझे पता है" माहीन ने मुस्कुराते हुए कहा।"तुम्हे ठंड लग जायेगी" दानियाल ने सोफे के आर्म पर रखी  चादर उसके पैर पर फैलाए कहा।  उसके दिल की धड़कने एक दम से तेज़ हो गईं । माहीन ने उसका हाथ थाम लिया था। "इतनी फिक्र क्यों करते हो" माहीन ने उसके और करीब होकर उसकी आंखों में देखते हुए बोली।जवाब में वो उसे सिर्फ देखता रहा।"बोलो....., अपनी आदत लगा कर छोड़ देने के लिए" माहीन ने कहा दोनों एक दूसरे की सांसों को महसूस करने की हद तक करीब थे।"मैं ऐसा नहीं हूं, मैंने पहले भी कहा है तुम से" उसका लहज़ा तो नॉर्मल था लेकिन जिस्म में बेचैनी एक लहर दौड़ गई।"मैं कैसे यकीन करू"  उसने जानबूझ कर गरम लोहे पर हथौड़ा मारा था।दानियाल उसके काफी करीब था। उसने अपनी उंगलियों से  माहीन के चेहरे पर बिखरे उसके भीगे बाल हटाए,  उसे गौर से देखा और  उसके होटों के करीब जाके रुका " क्या मुझे  इजाज़त है" उसका लहज़ा धीमा और नशीला था।जवाब में माहीन ने आंखे बन्द करली और दानियाल के नर्म होटों के लम्स ने उसके ठंडे जिस्म में तपिश की एक लहर दौड़ा दी।"क्या तुम्हे यकीन हुआ" वो सोफे से उठा और बोला।माहीन ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा" प्लीज़ मत जाओ।"वो उसकी तरफ झुका"माहीन, मेरे सब्र का इम्तेहान न लो" दानियाल के लहज़े में बेबसी थी।  "प्लीज़" माहीन की आंखें और बहुत कुछ कह रही थीं।उसने माहीन को अपनी बाहों में उठा लिया और कमरे का रुख कर लिया।अंधेरे कमरे में मोमबत्तियों की नाचती लौवें माहोल  और नशावर बना रही थीं...... (आगे अगले पार्ट में)By- Seema

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